
शब्दों के साथ मेरी यात्रा
मेरा नाम अनमोल दुबे है। मैं झाँसी का रहने वाला हूँ और पिछले कुछ वर्षों से लेखन, पत्रकारिता, किताबों और हिन्दी भाषा के साथ लगातार जुड़ा हुआ हूँ।
शुरुआत से ही मुझे लोगों को देखना, उनकी बातें सुनना और उनके अनुभवों को समझना अच्छा लगता रहा है। शायद यही वजह है कि धीरे-धीरे शब्द मेरे लिए सिर्फ लिखने का माध्यम नहीं रहे, बल्कि अपने आसपास की दुनिया को समझने का एक जरिया बन गए।
मैंने कविता लिखी, कहानियाँ लिखीं, लेख लिखे और व्यंग्य भी लिखे। मेरी कई रचनाएँ अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं और ऑनलाइन वेबसाइटों पर प्रकाशित होती रही हैं। लिखते हुए मैंने यह महसूस किया कि हर व्यक्ति के पास एक कहानी होती है, बस उसे सुनने और समझने वाला चाहिए।
किताबों से मेरा रिश्ता
किताबें मेरे लिए हमेशा से खास रही हैं। इसी लगाव से ‘BOOK वाला’ की शुरुआत हुई।
BOOK वाला एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, जहाँ हिन्दी किताबों और लेखकों के बारे में बातचीत की जाती है। मेरा मानना है कि अच्छी किताबों को सिर्फ पढ़ा नहीं जाना चाहिए, उनके बारे में बात भी होनी चाहिए। नए लेखक सामने आएँ, उनकी किताबों पर चर्चा हो और हिन्दी साहित्य ज्यादा से ज्यादा पाठकों तक पहुँचे, यही इस पहल के पीछे की सोच है।
मेरी अपनी किताब ‘कारवाँ गुलाम रूहों का’ भी इसी लेखकीय सफर का हिस्सा है। इस किताब को पाठकों का जो प्यार मिला, उसने मुझे आगे लिखते रहने का हौसला दिया।
अपनी मिट्टी से जुड़ाव
झाँसी और बुन्देलखंड मेरे लिए सिर्फ एक जगह का नाम नहीं है। यहाँ की मिट्टी, बोली, लोकजीवन और लोगों की अपनी एक अलग दुनिया है।
बुन्देली भाषा से मेरा लगाव भी इसी मिट्टी से आया है। देश के अलग-अलग मंचों पर हिन्दी और बुन्देली के लिए अपनी बात रखने का अवसर मिला है और यह मेरे लिए हमेशा खुशी की बात रही है।
मुझे लगता है कि अपनी भाषा और अपनी जड़ों से जुड़कर ही हम अपनी पहचान को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।
संपादन का अनुभव
लेखन के साथ-साथ संपादन ने भी मेरी यात्रा को काफी प्रभावित किया है।
अब तक अलग-अलग प्रकाशनों के लिए दो दर्जन से अधिक किताबों के संपादन का काम करने का अवसर मिला है। अलग-अलग लेखकों की किताबों के साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखने को मिला।
हर लेखक की अपनी भाषा और अपनी आवाज होती है। संपादन करते हुए मेरी कोशिश हमेशा यही रही है कि उस आवाज को बनाए रखते हुए किताब को बेहतर रूप दिया जा सके।
पत्रकारिता और वर्तमान काम
फिलहाल मैं दिल्ली में हिन्दी राजनीतिक कंटेंट राइटर के रूप में काम कर रहा हूँ।
पत्रकारिता ने मुझे समाज और राजनीति को बहुत करीब से देखने का मौका दिया है। रोज नए विषयों से सामना होता है और हर विषय अपने साथ कोई न कोई सवाल लेकर आता है।
लेखन और पत्रकारिता दोनों ने मुझे यह सिखाया है कि किसी भी विषय को समझने के लिए सिर्फ उसे देखना काफी नहीं है, उसके पीछे की कहानी को भी समझना जरूरी है।
आगे की राह
फिलहाल मैं बुन्देलखंड पर आधारित एक किताब पर काम कर रहा हूँ।
इस किताब के जरिए अपनी मिट्टी, यहाँ के लोगों, भाषा, संस्कृति और उन छोटी-छोटी कहानियों को दर्ज करने की कोशिश है, जो अक्सर बड़े इतिहास का हिस्सा नहीं बन पातीं, लेकिन किसी जगह की असली पहचान उन्हीं में छिपी होती है।
शायद मेरी लेखन यात्रा का सबसे खूबसूरत हिस्सा यही है कि हर नई किताब मुझे फिर से कुछ देखने, कुछ समझने और कुछ नया लिखने का मौका देती है।
मेरी कोशिश बस इतनी है…
जो देखा, उसे महसूस करके लिखूँ।
जो सुना, उसे समझकर लिखूँ।
और जो लिखा जाए, उसमें कहीं न कहीं इंसान और उसकी कहानी जरूर दिखाई दे।
अनमोल दुबे
लेखक · पत्रकार · संपादक